Saturday, 28 May 2011

(BP 73) हम तो परदेशी थे, दिल हमसे क्यूँ लगा बैठे



हम तो परदेशी थे दिल हमसे क्यूँ लगा बैठे 
अपने सीने में ये तूफ़ान क्यूँ उठा बैठे 

प्यार में डूबी हुई प्यार की दुश्मन दुनिया 
क्या दिवानो पे हुए जुल्म सब भुला बैठे 

डूब पे शबनम ज्यूँ होती सहर होते ही 
मान कर मोती उसे ख्वाब क्यूँ सजा बैठे 

दोस्त कहते थे मुझे मैं भी समझता था यही 
किस तरह तुम यूं मुहब्बत का हक़ जता बैठे 

ये हकीकत है कि रोता मैं बिछड़कर तुमसे 
क्यूँ बिछड़ने से ही पहले मुझे रुला बीते 
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हम तो परदेशी थे दिल हमसे क्यूँ लगा बैठे
अपने सीने में ये तूफ़ान क्यूँ उठा बैठे
चल पड़े राहे मुहब्बत जो हीर रांझो से
हीर रांझो पे हुए जुल्म क्या भुला बैठे
ओस की बूँद को उसने समझ लिया मोती
और फिर ख्वाब हसीं कोई वो सजा बैठे
इस तरह हाथ आप सबसे मिलाया न करें
कौन जाने है मुहब्बत का हक़ जता बैठे
ये हकीकत है बिछड़कर बहुत ही मैं रोता
क्यूँ बिछड़ने से ही पहले मुझे रुला बैठे
E20


डॉ आशुतोष मिश्र 

आचार्य नरेन्द्र देव कालेज आफ फार्मेसी बभनान गोंडा उत्तर प्रदेश 
9839167801

1 comment:

  1. ये हकीकत है की रोता मैं बिछड़कर तुमसे
    क्यूँ बिछड़ने से ही पहले मुझे रुला बैठे

    यक़ीन नहीं रहा होगा कि आप रोते इसलिए, आजकल सारे काम एडवांस कर लो तभी अच्छा.....अच्छी लाइन है

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