हौसलों के साथ ही लड़ता रहूँगा
घाव शब्दों के बड़े गहरे लगे हैं
सो रहे थे अभी तक, अब जगे हैं
हम सदा पथ पूंछते तुमसे रहे
मंजिलों की चाह अंतर में संजोये
कर दिए चरणों में अर्पित
भावना के पुष्प कोमल
चाह ही तपने की दिल में
चाहते थे दमक कंचन की सदा
हीरकों से हो कभी हममे चमक
कोयले थे खूब घिसना चाहते थे
तुम तपा दोगे यही सोचा था
तुम तराशोगे यही सोचा था
जौहरी तुमको समझकर
थाम ली ऊँगली तुम्हारी
किन्तु तुमने ही हमारे पांब में
डाल दी ये बेड़िया
बांध डाला भावना के सिन्धु को
काट डाला एक पनपती बेल को
कर दिए हर स्वप्न चकनाचूर
ढहा डाले महल सपनो के.....
सर झुकेगा क्या , गया जब टूट दिल
उँगलियाँ खुद छोड़ दूंगा में तुम्हारी
अब घिसुंगा स्वयं को
स्वयं को ही अब तरासूंगा
चाहे लुढकता रहूँ ताउम्र ही
अब स्वयं को ही मैं तपाऊंगा
चाहे जलूं ताउम्र ही
बूँद भर पानी यहाँ मिलता नहीं
चीरना सीना पड़ेगा मही का
कुछ नहीं मिलता यहाँ पर मागने से
चाहिए तो छीनना ही पड़ेगा
कहाँ मिलता है सभी को अमृत कलश
मैं हलाहल पान कर लूँगा
झुक गया तो टूट कर गिर जाऊँगा
इसलिए अब मेरु सा ही अडूंगा
ऐ! दिवाकर, दीप को आशीष दो
हौसले के साथ में लड़ता रहूँगा
कॉलेज जीवन की एक रचना
डॉ आशुतोष मिश्र
निदेशक
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801
यही जुझारूपन जीवन में बना रहे...
ReplyDeletebloj jagatt me jahan tak main juda hoon..aapka cooment karne ka andaj sarvatha bhinn hai..daad deta hoon aapke is hoonar ko
Deleteबहुत खूब ...यही हौसला होना चाहिए ...
ReplyDeletebas aapka asheerwad milta rahe..sadar pranam ke sath
Deleteचाहे लुढकता रहूँ ताउम्र ही
ReplyDeleteअब स्वयं को ही मैं तपाऊंगा
bahut khub ....aag mein tap kar sona hi nikalta hain ....
naman hai is saahar aur jujhaaroopan pe ...
ReplyDeletelajawab ...
सकारात्मक सोच के साथ लिखी गई रचना ..
ReplyDeleteजिजीविषा कायम रहे,आपकी सकारात्मक सोच और जुझारूपन को सलाम। ये भाव मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, जिसमें सत्कार्यों के लिये अपेक्षा दूसरों से न रखकर खुद के अंदर ही पैदा की जाये। नैट पर बहुत सक्रिय नहीं रह पा रहा हूँ, अनियमितता को अन्यथा नहीं लें आप।
ReplyDeleteसादर...
वाह!बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी.
ReplyDeleteकॉलेज जीवन की इस रचना को पढवाने के लिए
बहुत बहुत आभार आपका.
आपकी सकारात्मक सोच को नमन.
देरी से आपके ब्लॉग पर आने के लिए क्षमा चाहता हूँ.
समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईएगा.
rachnaa bhale hi kuchh pahale kee hai, magar taazagee bharee hai. yahee hai sarthakataa . shubhkamnaye.....
ReplyDeleteसुन्दर अभिव्यक्ति आशुतोष जी
ReplyDeleteझुक गया तो टूट कर गिर जाऊँगा
ReplyDeleteइसलिए अब मेरु सा ही अडूंगा
ऐ! दिवाकर, दीप को आशीष दो
हौसले के साथ में लड़ता रहूँगा
सुंदर प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।
समर्पण की खावाहिस... आत्म विस्वास के साथ ... सुंदर प्रस्तुति
ReplyDelete