गीत क्या लिक्खें कोई
गीत क्या लिक्खें कोई जब
मुट्ठी में जकड़े काल के
भूख का दानव भयंकर रूप धरता जा रहा है
सामने फैलाये मुख सुरसा सी महगाई खड़ी है
क्रोध में तपते रवि की तपन जैसा दौर है
मेघ में गर्जन , चपलता शेष चपला में नहीं
गीत क्या लिक्खें कोई जब...
घर गए मालिक के लेने
स्वयं लुट कर आ गए
सुदामा के चावलों को संतरी ही खा गए
नेह के बदले नयन से टपकता है लहू जब
सिसकते बचपन के सर पर कर नहीं ममता का कोई
गीत क्या लिक्खें कोई
जब शेष ना अवशेष भी चौपाल के.....
दर्द लिक्खेंगे बढेगा दर्द का अहसाश ही
कलम से कैसे लिखेंगे झूठ के खुशहाल हैं
मूल्य की प्रतिमाएं ही खंडित हुई जब
बुनियाद रिश्तों की हुई है तार-तार
गीत क्या लिक्खें कोई
जब सूखे कमल दल ताल के
हो गयी तब्दील नालों में नदी
शहर जिंदा लोगों का शमशान हो
ढेर पर बारूद के जब आशियाँ हो
मनुज तपती रेत पर मरते हिरन सा
गीत क्या लिक्खें कोई
जब रात में हों स्वप्न भी भूचाल के
डॉ आशुतोष मिश्र
निदेशक
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801
bahut jabardast bhaav sanjoye hain rachna me har shabd aaj ke samaaj ko aaina dikha raha hai.
ReplyDeleteसुंदर अतिसुन्दर रचना , बधाई .......
ReplyDeleteजब मन अशांत हो और उसमे बवंडर उठते हो तो कवि मन रचना करे भी तो कैसे???
ReplyDeleteबेहद सार्थक लेखन...
सादर.
ऐसे माहौल में सच कैसे कोई गीत लिखे .... अच्छी प्रस्तुति
ReplyDeleteआपकी इस कविता में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है।
ReplyDeletebadi shashakt prabhavi rachna
ReplyDeleteबड़ा कठिन हो जाता है तब मन को सहज रख पाना..
ReplyDeleteइस जीवन के कुछ कठिन पल
ReplyDeleteहोली है होलो हुलस, हाजिर हफ्ता-हाट ।
ReplyDeleteचर्चित चर्चा-मंच पर, रविकर जोहे बाट ।
रविवारीय चर्चा-मंच
बहुत गहरे विचार |
ReplyDeleteबढ़िया प्रस्तुति |
होली पर हार्दिक शुभकामनाएं |
आशा
सच कहा है ... ऐसे में गीत नही विप्लव की जरूरत है ...
ReplyDeleteगहन विचार ...
बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
ReplyDeleteरंगों के त्यौहार होलिकोत्सव की अग्रिम शुभकामनाएँ!
बहुत सुन्दर सार्थक रचना.
ReplyDeleteदिल का आक्रोश व्यक्त व प्रकट करती.
प्रस्तुति के लिए आभार.
होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.
बेहतरीन प्रस्तुति .होली मुबारक .
ReplyDeletewah sir!!
ReplyDeleteआक्रोश और बगावत ही भर गया है अब पन्नों और स्याहियों में ...परिवर्तन आवश्यक हो गया है |
ReplyDeleteकल 25/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
ReplyDeleteधन्यवाद!
ek samayik rachna... vartman halat se upji peeda ka bahut sshakt chitran.. lekhak ko badhai..
ReplyDeleteबेहतरीन प्रस्तुति।
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