Thursday 22 September 2011

(BP 61) अब तो जाग जाओ मेरे आका

धमाके से मुंबई दहली
जनता हिली
नेताओं के दिल दीपक की बाती नहीं जली
ताज से लपटें उठीं
सबको खली
नेताओ के दिल की पाषाण प्रतिमा नहीं पिघली
जर्मन बेकारी में हुआ धमाका
जू नेताओं के तन पर खूब चली
नेताओं ने करवट पे करवट बदली;
पर नींद नहीं खुली
हर गांव शहर जला
उनींदे  नेताओं ने कान में उंगली घुसाई
जू कान तक पहुंची पर रेंग नहीं पाई
संसद परिसर   में गोलियां चलीं
नेताओं में मची खलबली 
सिर्फ  अफशोस के साथ बात  टली
बिस्फोटों ने मुंबई को फिर हिलाया
सोते हुए नेताओं को जगाया
जागकर नेता ने फ़ोन उठाया
अपने रिश्तेदारों को लगाया
सबको सलामत पाकर
नींद को फिर गले लगाया
आम आदमी होता रहा त्रस्त
नेता रहा व्यस्त
रेलें उखड़ती रही
गाड़ियाँ भिड़ती रहीं
बाढ़ जन जीवन को निगल गयी
भूकंप से धरती हिल गयी
सुहाग   उजड़ा, सिन्दूर बिखरा
बच्चे यतीम हुए, रोये
बूढी आँखें पथरा गयी
जवानी बुढ़ा गयी
देश के बुजुर्गों जवानों ने मिलकर
परिवर्तन की आंधी चलायी
अपने वतन में अपनों को
अपनों ने अपनी बात  बताई
 दिल का लावा बह गया
दरिया-ए-अश्क हर दास्ताँ कह गया
कर्णधार सो रहे हैं
लोग रो रहे हैं
अरे  !
अब तो हो गया है संसद की नाक के नीचे धमाका
अब तो जाग जाओ मेरे आका





डॉ आशुतोष  मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा,उत्तरप्रदेश
मोबाइल न०-9839167801












Saturday 17 September 2011

(A2/33) कुत्ते को कुत्ता कह दो तो गुर्राता है



a2 se transfer 
फूलों से सजे मंच  पर
फूलों से लदे नेता
अपनी गर्दन इधर उधर हिला रहे थे
हाथ जोड़कर भीड़ को अभिवादन जता रहे थे
चापलूसी में व्यस्त चमचे
प्रशंसा  में कशीदे कढ़े जा रहे थे
मंच  पर खडे  नेताओं को ;
शेर बता रहे थे
ये नजारा देखकर मैं चकराया
अपने होंठों को हिलाया
भैये ये क्या गजब ढा रहे हो
सभ्य समाज में जंगल गीत गा रहे हो
अच्छे भले आदमियों को शेर बता रहे हो
तभी एक  चमचा  हमारे पास आया
हमें हिंदी व्याकरण समझाया
उसने बताया शेर वीरता का प्रतीक है
हिंदी साहित्य में उपमा देने की रीत है
धीर- वीर नेताओं का  सम्मान हो रहा है
वीरता के कारण शेर नाम से गुणगान हो रहा है
मेरे होंठों ने फिर मौन खोला
मैं फिर बोला
भैये शेर , हांथी गेंडो भैंसों से पंगा नहीं ले पाता है
छुपकर घात लगाता  है
अपनी कमजोर प्रजा को निवाला बनाता है
नेता भी अपने बाप  के आगे सर झुकाता  है 
कमजोर गरीब बेसहारा
आम जनता का खून  पी जाता है
क्या नेता इसीलिए शेर कहलाता है
जनता की ताकत नेता को बहादुर  बनाती है
जनता बिमुख हो तो नेता   की हवा निकल जाती है
व्याकर्नाचार्यों से व्याकरण की सीख ले
मैंने भी  उपमा का उपयोग अपनाया
नेताओं को  बफादारी की नसीहत देने
कुत्ता  शब्द प्रयोग आजमाया
ये बात चमचों को खल गयी
हवा की दिशा ही बदल गयी
सर पर पैर रखकर  जान  बचा  ली   
अब  जान बची तो लाखों पाए
पर राज- नीति  की महिमा समझ पाए
जिसने हर नियम कानून को;
अपने हिसाब से तोडा मरोड़ा है
उसने अब मात्रभाषा   को भी   नहीं छोड़ा है
कभी शेर, शेर नहीं; बीरता हो जाता है
कभी कुत्ता शब्द  बफादारी का  नहीं
सिर्फ कुत्ते का प्रतीक बन जाता है
कुत्ते को शेर कहो तो ;
 गर्व  से सीना फुलाता है
कुत्ते को कुत्ता कह दो तो

गुर्राता है

फूलों से सजे मंच  पर
फूलों से लदे नेता
अपनी गर्दन इधर उधर हिला रहे थे
हाथ जोड़कर भीड़ को अभिवादन जता रहे थे
चापलूसी में व्यस्त चमचे
प्रशंसा  में कशीदे कढ़े जा रहे थे
मंच  पर खडे  नेताओं को ;
शेर बता रहे थे
ये नजारा देखकर मैं चकराया
अपने होंठों को हिलाया
भैये ये क्या गजब ढा रहे हो
सभ्य समाज में जंगल गीत गा रहे हो
अच्छे भले आदमियों को शेर बता रहे हो
तभी एक  चमचा  हमारे पास आया
हमें हिंदी व्याकरण समझाया
उसने बताया शेर वीरता का प्रतीक है
हिंदी साहित्य में उपमा देने की रीत है
धीर- वीर नेताओं का  सम्मान हो रहा है
वीरता के कारण शेर नाम से गुणगान हो रहा है
मेरे होंठों ने फिर मौन खोला
मैं फिर बोला
भैये शेर , हांथी गेंडो भैंसों से पंगा नहीं ले पाता है
छुपकर घात लगाता  है
अपनी कमजोर प्रजा को निवाला बनाता है
नेता भी अपने बाप  के आगे सर झुकाता  है 
कमजोर गरीब बेसहारा
आम जनता का खून  पी जाता है
क्या नेता इसीलिए शेर कहलाता है
जनता की ताकत नेता को बहादुर  बनाती है
जनता बिमुख हो तो नेता   की हवा निकल जाती है
व्याकर्नाचार्यों से व्याकरण की सीख ले
मैंने भी  उपमा का उपयोग अपनाया
नेताओं को  बफादारी की नसीहत देने
कुत्ता  शब्द प्रयोग आजमाया
ये बात चमचों को खल गयी
हवा की दिशा ही बदल गयी
सर पर पैर रखकर  जान  बचा  ली   
अब  जान बची तो लाखों पाए
पर राज- नीति  की महिमा न समझ पाए
जिसने हर नियम कानून को;
अपने हिसाब से तोडा मरोड़ा है
उसने अब मात्र- भाषा   को भी   नहीं छोड़ा है
कभी शेर, शेर नहीं; बीरता हो जाता है
कभी कुत्ता शब्द  बफादारी का  नहीं
सिर्फ कुत्ते का प्रतीक बन जाता है
कुत्ते को शेर कहो तो ;
 गर्व  से सीना फुलाता है
कुत्ते को कुत्ता कह दो तो
गुर्राता है 1 


 डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा,उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801











Friday 16 September 2011

(A1/8) वाह रे मालिक क्या युक्ति निकाली है

राजनीती  के  अधार्मिकीकरण  से  क्षुब्ध
खुदा  के  एक   बन्दे  ने  मन  ही  मन  सोचा
क्यों   न  धार्मिकीकरण  की  मुहीम  चलाई   जाए
नव  क्रांति  की  चेतना  फैलाई  जाई
यह  सोचकर  एक  नयी  पार्टी  बनाई
 लोगों  में  एक  नयी  अलख  जगाई
ये  बात  एक  बाहुबली  नेता  को  खल  गयी
उसकी  हैवानियत  मचल  गयी
बौखलाहट  तमाचे  की  शक्ल  में
खुदा  के  बन्दे  के  गालो  पर  उतर  गयी
बन्दे  की  आँखें  क्षलक्षलाई  
जिसने  देखा  उसकी  आँखें  भर  आई
बन्दे  ने  आसमान की  तरफ  सर    उठाया   
फिर न  जाने क्या  सोचकर  मुस्कुराया
बन्दे  की  आखों से  टपकते  अश्क
सम्बेदना  के  बीज  बो  गए   
जो  उसे   जानते  भी   न  थे;
उसके   हो    गए   
कुछ  दिनो    बाद   खबर आयी
बाहुबली  को  बस    कुचल गयी
खुदा के बन्दे की  सीट निकल गयी
इश्वर  से  मेरी  दूरियां  फिर  सिमट   गईं   
फिर दिल  से   उठी  कुछ  हलचलें  
होंठों  को  चीरकर  बातावरण  में  घुल  गयी
मेरे  आंसुओं  ने  कहा
वाह रे  मालिक  क्या  युक्ति  निकाली  है
भक्त  की  परीक्षा  भी  कर  डाली  है
पापी  के  पाप  की  घडिया  भी  भर  डाली  है

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र दो कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल नो 9839167801

Saturday 10 September 2011

(A1/6) मन तो पागल हो जाता है


मन तो पागल हो जाता
जब अलि कलि पे मिल जाता  
रिमझिम रिमझिम रिमझिम रिमझिम
रिमझिम रिमझिम रिमझिम रिमझिम 
सावन जब नगमें गाता
मन तो पागल हो जाता है 
मन तो .........................
कल-कल कल-कल करती तटिनी
झर-झर  झर -झर झरते झरने
योवन के चरमोत्कर्ष पे
जब गुलाब खिल जाता है
मन तो पागल हो जाता है 
मन तो .........................
पनघट पे पानी भरती
अल्वेली अल्हड पनिहारिन
लहर लहर लहराए कमरिया
आँचल नहीं संभाला जाता
मन तो पागल हो जाता है 
मन तो .........................
तपती तेज रवि किरने
मुझको बैचैन नहीं करती
सौम्य शांत शीतल शशांक से
जब तन मन जल जाता है
मन तो पागल हो जाता है 
मन तो .........................
जब तक था हमसफ़र साथ में
रूठे रूठे रहते थे
जुदा हुए दो ही पल में जब
दर्दे दिल बढ़ जाता है
मन तो पागल हो जाता है 
मन तो .........................



डॉ आशुतोष मिश्र
निदेशक
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी 
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801   

Monday 5 September 2011

(A2/2) फिर बन लावा बहना होगा

भ्रस्टाचार  उन्मूलन  आन्दोलन  के  दौरान  जन  भावना  और  सरकार की  कूटनीति  को  उकेरती  रचना


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पहले  ज्वालामुखी   हो  जाओ
फिर  सोना  है  तो  सो  जाओ
अंतर  का  लावा  पिघलाओ
अपने  अन्दर  आग   जलाओ
सौम्य  दिखो  बाहर  से  जितना
पर  न  निज  मकसद  बिसराओ
परिवर्तन  की राह  कठिन है
अभी  दूर  अपनी  मंजिल  है
स्वप्न  तिरोहित  न हो जाएँ  
खुशी- खुशी ये  ना खो  जायें  
गिरगिट  जैसा  रंग  बदलते
नहीं  भरोसा  शैतानो  का
गुल, गुलदस्ता, चमन  हमारा
नहीं किसी  भी  बेगाने  का 
राहे -ए -मंजिल   पर  ये खुशियाँ  
कभी- कभी  भरमा  जाती  है
चाहत  का वो  चाँद  दूर रख  
तारों   से बहला  जाती हैं  
एक  बार   जिस  तरह  जुड़े  हम
बार- बार  जुड़ना  होगा
एक इशारा  मिलते  ही  बस  
नींद    तोड़    जगना  होगा
एक जाग्रत  ज्वालमुखी सा  
फिर बन  लावा बहना   होगा   

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा,उत्तरप्रदेश
मोबाइल नो 9839167801
A2/2
Blog mein transfer

पहले  ज्वालामुखी   हो  जाओ
फिर  सोना  है  तो  सो  जाओ
अंतर  का  लावा  पिघलाओ
अपने  अन्दर  आग   जलाओ
सौम्य  दिखो  बाहर  से  जितना
पर    निज  मकसद  बिसराओ
परिवर्तन  की राह  कठिन है
अभी  दूर  अपनी  मंजिल  है
स्वप्न  तिरोहित   हो जाएँ  
खुशीखुशी ये  ना खो  जायें  
गिरगिट  जैसा  रंग  बदलते
नहीं  भरोसा  शैतानो  का
गुलगुलदस्ताचमन  हमारा
नहीं किसी  भी  बेगाने  का 
राहे - -मंजिल   पर  ये खुशियाँ  
कभीकभी  भरमा  जाती  है
चाहत  का वो  चाँद  दूर रख  
तारों   से बहला  जाती हैं  
एक  बार   जिस  तरह  जुड़े  हम
बारबार  जुड़ना  होगा
एक इशारा  मिलते  ही  बस  
नींद    तोड़    जगना  होगा
एक जाग्रत  ज्वालमुखी सा  
फिर बन  लावा बहना   होगा   

लिखिए अपनी भाषा में