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Wednesday, 30 May 2012

नाम दिल पर जो लिखा उसको मिटाकर देखो

एक दिन  अपने पराये को भुलाकर देखो 
एक दिन यूं ही नजर हमसे मिलाकर देखो 


मेरे सीने में जो दिल है, वो धडकता भी है 
आह निकलेगी कोई, इसको जलाकर देखो 


नाम तुमने जो मिटाया,था रेत पर लिक्खा
दिल पर लिक्खा कोई  हर्फ़ मिटाकर देखो 


जुल्फें यूं गुल से संवारी  हैं रोज ही तुमने
मेरी तस्वीर कभी दिल में सजाकर देखो


तेरे रुखसार पर जुल्फें तो बहुत भाती हैं 
तुम मगर रुख से ये जुल्फें हटाकर देखो 


जाम पर जाम पिए होश में मगर हम हैं
हसरत-ए-दिल है आँखों से पिलाकर देखो 
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डॉ आशुतोष मिश्र
निदेशक
आचार्य  नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी 
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801






Saturday, 26 May 2012

वतन के हर सच्चे सिपाही को हैं हवालातें


रंग--तस्वीरें अभी वही हैं,हैं वही बातें 
अमन--चैन से कटती नहीं अभी रातें 

दल बदल जाते उसूलात  बदलते ही नहीं  
 कोई महफूज़ रहे कैसे, चारसू लगीं घातें

लहू जिसका बहा है स्वेद बन के खेतों में
मोती पैदा किये,अश्कों की मिलीं सौगातें

स्वेद से तर-बतर रहा है जो रात--दिन
उसके जेहन में भी बचपन की हसीं बरसातें

होती  हैवानों, दरिंदों की ताजपोशी  यहाँ
वतन के हर सच्चे सिपाही को हैं हवालातें

मिटेगा "आशु ",मिटेंगे उसके नक़्शे कदम  
वतन की राह पे मुमकिन हों मुलाकातें  





डॉ आशुतोष  मिश्र 
आचार्य  नरेन्द्र  देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी 
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल नो 9839167801
         

Saturday, 19 May 2012

जिंदगी तेरी उदासी का कोई राज भी है


जिंदगी तेरी उदासी का कोई राज भी है
तेरी आँखों में छुपा एक हंसी ख्वाब भी है


सूखे पत्तों सी बिखरती है जिंदगी जब भी
यूं समझना की कोपलों का ये आगाज भी है 


गीत कोई भी गुनगुना लो जब भी हो तनहा
धड़कन-ए-दिल, साँसों का हंसी  साज भी है 


उस खुदा ने बनाया है यहाँ मुकद्दर सबका
सबका अपना है हुनर, अपना अंदाज भी है 


काम करना ही हमारा है बस  इबादत रब की 
हाथ मालिक का मेरे सर पे हंसी ताज भी है 


इस ज़माने की बेहिसाब सी नफरत पर  ना जा
"आशु" कुछ लोग हैं जिनको तुझपे नाज  भी है 





डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी 
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल नो  9839167801


Thursday, 10 May 2012

क्या करें तीर-ए-नजर छुप के चला देते है

अपनी पलकों को उठाकर  के गिरा देते हैं
बस घडी भर में  हमें अपना  बना लेते हैं


उनकी जुल्फों को हम गुल से सजा देते हैं  
और  वो हो के भी गुल हमको सजा देते हैं 


हसरत -ए-दिल ये हमारी जवां नहीं होती
क्या करें तीर-ए-नजर छुप के चला देते है  


छुप के लिखते हैं  मेरा नाम रेत पर तनहा 
हल्की आहट पे मेरी  रेत- रेत बना देते हैं


मुफलिसों की तरह हम उम्र भर तरसते रहे 
और एक  वो हैं जो  गुहर यूं ही लुटा देते हैं


बर्क जब- जब भी उसने खोले किताबों के हैं
सूखे गुल जो याद दिलाते, वो भुला देते हैं 


उनकी आँखों  के समंदर तो बड़े  कातिल हैं 

देखो 'आशु' ये  बजूद -ए-दरिया मिटा देते हैं






डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज  ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न०  9739167801





















Saturday, 5 May 2012

बाके नैन कजरारे हैं

तन की भी सुध नहीं मन की भी सुध नहीं
प्रीत ने ये आज कैसे , पंख से पसारे हैं
कैसे नहीं देखूं कैसे जोहूँ नहीं बाट भला
हाय राम हाय बाके नैन कजरारे हैं


गलियों में आती रोज, धूम सी मचाती रोज
बागों, बागानों में दिल  फूलों का जलाये हैं
तो कैसे आँखें बंद करूं, कैसे मुह फेरूँ भला
हाय राम हाय, बांके कातिल इशारे हैं


कोयल सी कूकती है, इत उत डोलती है
चाल चले नागिन को, मात दे जाए रे
तो कैसे नहीं टाकून  और कैसे नहीं झाँकूँ भला
हाय राम हाय कैसे प्यारे ये नज़ारे हैं


कभी मुस्काये कभी चुप रह जाए
धरती के रंग जैसे इसने सजाये हैं
तो कैसे अनदेखी करूँ कैसे बिसराऊँ भला
हाय राम हाय तीर नजरों के मारे हैं


डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तर प्रदेश
मोबाइल न० 9839167801





Saturday, 28 April 2012

वाह क्या सौगात दी है

वाह क्या सौगात दी है
मांगते हरदम रहे हो
प्यार भी, सद्भाव भी
पूरा समर्पण भी,
हम बहाते रहे अपना  खून अब तक
शान पर,झूठी, तुम्हारी आन पर....
पलकें अपनी मूँद के चलते रहे
लगी कितनी ठोकरें
गिरते रहे..
दिया तुमने क्या हमें
सोचा कभी?
रोटियों को हम तरसते,
अश्क आँखों से बरसते
पाँव कीचड में सने हैं
टूटा दिल हैं अनमने हैं
झोपड़े; अपने महल थे
जैसे थे; अच्छे भले थे
क्या हुआ, तुमको खले क्यों  
मंजिलों  पे मंजिलें ,तुमने खड़ी की
झोपड़ों पे पाँव  रखकर
क्या हुआ? ए  कार वालों
क्यूँ दिया उसको  कुचल
कर झोपड़ों से बेदखल
क्या बिगाड़ा  था , भला मासूम ने
लूट ली इज्जत भरे बाज़ार में....
आसुओं  का बाँध
नफरत, द्वेष, दरिया दर्द का
ये ढेर लाशों के 
वाह! क्या सौगात दी हैं




कॉलेज जीवन की एक कृति


डॉ आशुतोष मिश्र
निदेशक
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801






















Wednesday, 18 April 2012

जिस घडी उससे जुदा होने की घडी आयी

जिस घडी उससे जुदा  होने  की घडी  आयी
दरिया- अश्कों का बहा, याद भी बड़ी आयी 

सीढ़ियों पे ही मुझे रोका था  कुछ कहने को 
होंठ हिल पाए ना थे  अश्कों की झड़ी आयी 

आँखों- आँखों में  आँखों ने सगाई  कर ली 
दर-ए -दिल पाती जाने कबसे है पड़ी आयी 

दो बदन, एक जिस्म- एक जां, ना हो पाए 
दरम्याँ धर्म-ओ-रिवाजों की हथकड़ी आयी 

हमने सोचा था की अरमानो के बम फूटेंगे 
हाय री किस्मत , मेरे हाथों  ये लड़ी आयी 

आशु तनहा ही मैकदे में मय कशी करते 
जिंदगी में है उनके जबसे  फुलझड़ी आयी 


डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज  ऑफ़ फार्मेसी
बभनान , गोंडा, उत्तरप्रदेश 
मोबाइल न० 9839167801





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