Friday, 27 March 2020

❤️Tr KS6/45 ks 6001collection(OB 124) बोतल में जब तलक थी मै महफ़िल सजी रही



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 जब तक भरे थे जाम तो महफ़िल सजी रही
फूलों में रस था भँवरों की चाहत बनी रही

वो सूखा फूल फेंकते तो कैसे फेंकते
उसमे किसी की याद की खुशबू बसी रही

उस कोयले की खान में कपड़ें न बच सके
बस था सुकून इतना ही इज्जत बची रही

कुर्सी पे बैठ अम्न की करता था बात जो
उसकी हथेली खून से यारों सनी रही

दौलत बटोर जितनी भी लेकिन ये याद रख
ये बेबफा न साथ किसी के कभी रही

'आशू' फ़कीर बन तू फकीरीं में है मजा
सब छूटा कुछ बचा तो वो नेकी बदी रही

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान गोंडा उत्तरप्रदेश 271313
9839167801
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Thursday, 26 March 2020

(OB 127) इक्कीस दिन की कैद में कैसे समय बिताय

अपने अपने घरों की जेल में कैद (नजरबन्द) सभी क्रांतिकारियों का नमन। 

पंख कटे पंछी हुए ,सीमित हुयी उड़ान
सर पे अम्बर था जहाँ, छत है गगन समान

सारी दुनिया सिमट कर कमरे में है कैद
घर के बाहर है पुलिस, खड़ी हुई मुश्तैद

जिनकी  शादी  ना हुयी , उनकी मानो खैर
और हुयी जिनकी न लें, घर वाली से बैर

घर के कामो में लगें, हर विपदा लें टाल
साँप छुछूंदर गति न हो, करफ्यू या भूचाल

भागवान से लड़ नहीं, बात ये मेरी मान
भागवान के केस में, चुप रहते भगवान

प्रथम दिवस आखिर कटा, साँसों में थे प्रान
मगर रात धरती लगी, जैसे हो श्मशान

लक्ष्मण रेखा खिंच गयी,घर में रखना पाँव
आस्तीन के सांप सा, कोरोना का दाँव

राशन लेने जब गये, मन मन ही घबराय
ना जाने किस भेष में, कोरोना मिल जाय

अस्ल गधे तो छिप गए, नकली करें धमाल
चौराहे पर अब जिन्हें, पुलिश कर रही लाल

हाथ जोड़ सेवक करे, सबसे ही फरियाद
लेकिन सारी योजना , चंद करें बरबाद

हँसी ठिठोली हो चुकी,सुनो काम की बात
उल्टी गिनती है शुरू, चूके समझो मात

हिन्दू मुस्लिम सोच है, सत्य महज इंसान
कोरोना ये ज्ञान दे, हर के सबके प्रान

खड़े दूर थे पंक्ति में, हिन्द वतन के लोग
अनुशासन का पाठ भी सिखा रहा ये रोग

"आशू" हल्के में न ले, बिपदा ये गंभीर
छूट गया जो चाप से, कब लौटा वो तीर

डॉ आशुतोष मिश्र "आशू"
आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज ऑफ फार्मेसी।
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
9839167801
www.ashutoshmishrasagar.blogspot.in



Saturday, 21 March 2020

(OB 126}) कोरोना का कोरोना (का रोना)



कोरोना का कोरोना(का रोना)
कोरोना का कुछ कोरोना (करो ना)

जितना हो सकता हो दूरियां बनाइये
मुख से न कहके बात नयन से जताइये

घबराइये न दिल को दिलासा दिलाइये
विपदा की घड़ी में भी बस  मुस्कुराइये

जीभर  के बात अपनी सबको सुनाइये
बस थोड़ा और अपने मुँह को घुमाइये

घर जो आये हाथ  सोप से धुलाइये
पी के नींबू नींद भी गहरी लगाइये

बस प्राणायाम योग  ध्यान आजमाइये
प्रतिरोध की जो क्षमता उसको बढाइये

जो होलिका है भीतर उसको जलाइये
गुटके की पीक यूँ न हवा में  उड़ाइये

हो घूमने का मन  तो जरा भांग खाइये
तन हो न  टस से मस दिमाग को घुमाइये

वो मौज मस्ती सैर सपाटा भुलाइये
बाहर के खाने को न हाथ भी लगाइये

सामान हाट से न थोक में मंगायिये
गोदाम भूलकर भी न घर को बनाइये

बातों में बस विरोध के सुर न उठाइये
अपने सिपाहियों का मनोबल बढाइये


स्वरचित
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज ऑफ फार्मेसी बभनान गोंडा
उत्तरप्रदेश 271313
www.ashutoshmishrasagar.blogspot.i.






Thursday, 19 March 2020

(OB 125) चीटी भी नन्ही हाथी की ले सकती जान है


चीटी भी नन्ही हाथी की ले सकती जान है
कोरोना ने कराया हमें इसका भान है।

हाथों को जोड़ कहता सफाई की बात वो
पर तुमको गंदगी में दिखी अपनी शान है।

बातें अगर गलत हों तो बाजिब विरोध है
सच का भी जो विरोध करे बदजुबान है।

नक़्शे कदम पे तेरे  क्यूँ सारा जहाँ चले
बातों में बस तुम्हारी ही क्या गीता ज्ञान है

कोरोना की ही शक्ल में नफरत है चीन की
जिसके लिए जमीन ही सारी जहान है

मालिक के दर पे सज्दा वजू करके ही करूं
संदेश कितना बढ़िया ये देती कुरआन है

मालिक के दर पे  आशू चलो मांग लें दुआ
जल्दी चलो हरम में शुरू फिर अजान है

डॉ  आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज ऑफ फार्मेसी, बभनान गोंडा
उत्तरप्रदेश 271313
9839167801
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Wednesday, 19 September 2018

🟧 (OB 121) सौदागर (लघुकथा)

🟧. TR KS 5001C

सौदागर
” प्रोफेसर सैन और प्रोफेसर देशपांडे सरकारी मुलाजिम हैं, तनख्वाह भी एकै जैसी मिलत है लेकिन ई दुइनो जब से निरीक्षक भइ गए हैं तब से प्रोफेसर सैन तो बड़ी बड़ी लग्जरी गाड़ियों में दौरा करत है और बड़े आलीशान होटलों में बसेरा करत हैं लेकिन ..लेकिन बेचारे देशपांडे कभी धर्मशाला में ठहरत हैं तो कभी सरकारी गेस्ट हाउसन में ...कभी ऑटो से चलत हैं तो कभी बस में ....जब सब सुख सुबिधा बरोबर है तब ई फरक काहे है ई बात तनिक हमरी समझ में नाहीं आवत है “ राहुल ने अपने मित्र सुजीत से बडी जिज्ञासा के साथ पूंछा
“ अरे ! ईमें कौन बात है , प्रोफेसर सैन के बाप दादा ने खूब पैसा कमाया होगा और उसी के दम पर वो शाही जिन्दगी जिया करत हैं “
“ अरे ! काहे का बाप दादा का पैसा , हम ई प्रोफेसर साहिब के बाप का भी इतिहास जानत हैं और बाबा का भी ...एक छोटी सी राशन की दुकान की दम पर दुई वक़्त की रोटी बड़ी मुश्किल से नसीब होती थी “
“ अरे ! तो हो सकता है सैन साहिब सौदागर हों “
“सौदागर, कईसन सौदागर ....बिन दूकान , बिन सौदा के ई कैसे सौदागर हुयी सकत है “ झुंझलाते हुए राहुल ने सुजीत से सवाल किया
“ अरे !सौदागर बने के खातिर ई कौन जरूरी है कि सौदा भी हो और दुकान भी – अरे सौदा जमीर का भी तो हुए सकत है “ सुजीत ने गंभीर होते हुए कहा
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान गोंडा उत्तर प्रदेश

Sunday, 6 May 2018

(OB 119) हम तो बस आपकी राह चलते रहे


२१२ २१२  २१२  २१२
हम तो बस आपकी राह चलते रहे
ये ख़बर ही न थी आप छलते रहे
बादलों से निकल चाँद ने ये कहा
भीड़ में तारों की हम तो जलते रहे
हिम पिघलती हिमालय पे ज्यों धूप  में
यूँ हसीं प्यार पाकर पिघलते रहे
चांदनी भाती , आशिक हूँ मैं चाँद का 
सच कहूं तो दिए मुझको  खलते रहे
जुल्फ की छांव में उनके जानो पे सर
याद करके वो मंजर मचलते रहे
 
जिस घड़ी एक दूजे में हम थे मगन
जाने क्यूँ रुख पे आँसू फिसलते रहे
जिस तरह आसमां से है सूरज ढले 
हुस्न भी हुस्न वालों के ढलते रहे 
हमसफ़र है हसीं इसलिए दोस्तों
रह में "आशू" मगन हो के चलते रहे
डॉ आशुतोष मिश्र आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान गोंडा उत्तर प्रदेश 9839167801

Friday, 15 September 2017

OB1 जिन्दा है आदमी यहाँ उम्मीदों के सहारे

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ज़िंदा है आदमी यहाँ उम्मीदों के सहारे
मझधार फंसी कश्ती भी लग जाती है किनारे

इस जिंदगी में मुझसे न देखे गए कभी हैं
यारों की आँखों बहते हुए अश्कों के ये धारे

पागल कोई कहे कोई कहता है दीवाना
जिसको लगूँ मैं जैसा मुझे बैसे पुकारे

नजरें टिकी भले हों जमानें की चाँद पर
गाफिल हूँ मुझे आज भी प्यारे लगें सितारे

इंसान शूल गर नहीं बोता जहान में तो
हालात ये न होते न होते ये नज़ारे

इंसान खुदा खुद को समझने लगा है जब
इंसानों को मुश्किल से भला कौन उबारे

आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेंद्र देव कालेज आफ फार्मेसी बभनान गोंडा
9839167801

Friday, 28 July 2017

(OB 51) चलते चलते इन राहों में जब मिल जाते हो तुम

2222          2222        2222  22  
चलते चलते इन राहों में जब मिल जाती  हो तुम
जाने क्या हो जाता है जो यूं शरमाती  हो तुम

तेरी आँखों में लगता है काला कोइ जादू
जिसपे नजरें पड़ जाती उसको भरमाती हो तुम

इक पल को आती  हो छत पर फिर गुम हो जाती हो
क्या बच्चो के जैसा ही मुझको बहलाती हो तुम?

उजला खिला तुम्हारा यौवन जब  फूलों सा भाये
तब क्यूँ छुईमुई सा छू लेने पर सकुचाती हो तुम 

तेरी इन मादक आँखों से मदिरा छलका करती
मुझ जैसे सीधे सादो को क्यूँ बहकाती  हो तुम

जर्रे-जर्रे को बागों के जैसे गुल महकाते 
बैसे घुल साँसों में जीवन को महकाती हो तुम

सागर लहरों में इक नैया ज्यों हिचकोले खाए
पागल हो मन जब इक नागिन सा लहराती हो तुम

चंचल मन मदमाता योवन नीली- नीली आँखें
तिरक्षी नजरों से प्रेमी मन को ललचाती हो  तुम
डॉ आशुतोष मिश्र BP1 
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान गोंडा उत्तर प्रदेश 9839167801


Friday, 5 May 2017

(BP2) जौ की रोटी महुए की चटनी

जौ की रोटी महुए की चटनी 
पड़ोस में रहने वाले मेरे एक मित्र मिस्टर शर्मा
एक दिन बड़े सबेरे ही घर पर आये
और चाय की चुस्कियो के साथ साथ
चुनावों पर चर्चा करते हुए
स्वास्थ्य के मुद्दे पर प्रश्न उठाये
बोले मिश्रा जी सेहतमंद होने के
कुछ बेहतर तरीके बताईये
ज्यादा दौड़ भाग के बिना काम चल जाए
कुछ उपाय सुझाईये
जवाब में मैंने उन्हें प्यार से समझाया
शर्मा जी जौ की रोटी
अंगूर और महुए की चटनी के साथ खाईये
बेहतर स्वास्थ्य के साथ
समाज सेवा के प्रति अपना दायित्व भी निबाहिए
शर्मा जी मशविरा सुनते ही सकते में आये
बोले स्वास्थ्य की बात तो रास आयी
लेकिन समाज सेवा की आपकी बात
गले से नहीं उतर पायी
उनको देखकर हैरान
मैंने शिष्टता से कहा समाधान हाज़िर है श्रीमान
देखिये मुझे ही देखिये
मैं जौ की रोटी
अंगूर और महुए की चटनी साथ खा
अपना स्वास्थय भी बना रहा हूँ
और जौ के बेटे से
अंगूर और महुए की बेटी से नयी पीढी को बचाकर
समाज के प्रति अपना फ़र्ज़ भी निबाह रहा हूँ
शर्मा जी आप और आप जैसे
अगर ये फार्मूला अपनाएगे
तभी जौ के बेटे अंगूर और महुआ की बेटी की
जन्म से पहले हत्या कर पायेंगे
खुद सोचिये जब नहीं होंगे
जौ अंगूर महुए के बेटा बेटी
हमारे बेटा-बेटी कैसे लड्खडायेंगे
लेकिन दे कर मशविरा हम पछता रहे हैं ‘
रोज बीबी के ताने प्रसाद में पा रहे है
शर्मा जी को मशविरे की तारीफ़ रोज कर जाते हैं
पिछले दो महीनो से खाना मेरे घर खाते है
डॉ आशुतोष मिश्र 
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान गोंडा उत्तर प्रदेश मोबाइल नो 9839167801

Friday, 24 March 2017

(BP3) जिन्दगी कितनी ही जाने इक कहानी हो गयीं


जिन्दगी कितनी ही जाने इक कहानी हो गयीं
ताज बदले तो कई बातें पुरानी हो गयीं

इक नए सूरज के उगते ही छितिज़ पर यूं लगा
चारसू जैसे फिजाये ही सुहानी हो गयीं

अब कलम कागज की उनको है जरूरत ही कहाँ
जिन को लिखना था वो सब बातें जुवानी हो गयीं

कृष्ण के भीतर कही कुछ बात निश्चित खास थी
यूं नहीं सब गोपियाँ उसकी दीवानी हो गयीं

उजड़े ये घर, टूटी सडकें गन्दगी चरों तरफ
मुल्क की पहचान क्या ये ही निशानी हो गयीं

देखकर इस धूप को आँगन में पहली बार यूं
कोपलें मेरे चमन की जाफरानी हो गयीं

ये हकीकत की जमी उम्मीद से ज्यादा थीं सख्त
हौसलों से ख्वाहिशे पर आसमानी हो गयीं 

डॉ आशुतोष मिश्र 
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी बभनान गोंडा  उत्तर प्रदेश 
मोबाइल नो ९८३९१६७८०१
www.ashutoshmishrasagar.blogspot.in

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