Saturday, 3 December 2011

(A1/40) अभागा मजदूर



एक छोटी झोपडी में
एक छोटा सा दिया
जो सतत लड़ रहा है 
गहन तम से...
छेदों वाली थाली में
एक रोटी और
थोडा सा नमक लेकर
मलिन बस्त्रों और गमछे में
अपने  घुटनों को  पेट से सटाए
देख रहा है
झोपड़ी के सामने से गुजरता
पंक से परिपूर्ण पथ
और कोल्हुओं के बैल जैसा
एक सीमित सी परिधि में
खोज रहा है 
छांव  सुख की
सोच रहा है ......
कितने कूप खने
कितने बाँध बांधे
पर प्यासा हूँ!
याद आ रही हैं
रसालों से लदी
आम्र-तरु-साखें
जिन्हें सींचा था कभी 
अपने लहू से
खुद अतृप्त रहकर....
किन्तु आज भी
मालिकों के खौफ
बिष में बुझे शब्दों
हर पल होते मान -सम्मान के  हनन से
तिल- तिल जलता हुआ
पलकों को झुकाए
याचकों सा हाँथ फैलाये
डूबता जा रहा है कर्ज में स्वयं
दूसरों की तृप्ति का पर्याय
अभागा  मजदूर 




कॉलेज जीवन की एक कृति




डॉ आशुतोष मिश्र
निदेशक
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, 9839167801
































17 comments:

  1. औरों का आधार निर्माण करने वाला ही आधारहीन।

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  2. छेदों वाली थाली में
    एक रोटी...
    डूबता जा रहा है कर्ज में
    दूसरों की तृप्ति का पर्याय
    अभागा मजदूर ... yahi hota hai

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  3. bahut sundar abhivyakti yathaarth ki. majdoor kaa dard sabse bada hai , jiski shikaayat wah kabhi nahin karta balki chupchaap niyati ke saath samjhauta kiye aage badhta rehta hai.

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  4. मार्मिक सत्य का चित्रण्।

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  5. सामयिक , सारगर्भित प्रस्तुति, आभार.

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  6. सुन्दर प्रस्तुति ||

    बधाई ||

    http://terahsatrah.blogspot.com

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  7. यथार्थ और मार्मिक प्रस्तुति ...

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  8. सच के करीब है ये कविता ..........आभार

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  9. रचना भले ही आपके कालेज जीवन की है पर आज भी उतनी ही सच है. विडम्बना यही है, अन्न देने वाला भूखा है.

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  10. सच्चाई को आपने बड़े खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है! मार्मिक प्रस्तुती!
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com/

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  11. यही तो विडंबना है सर, जो सबसे अहम है वही सबसे ज्यादा शोषित-पीडि़त है।
    आपकी संवेदनशील दृष्टि को सलाम।

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  12. बहुत सुन्दर प्रविष्टि...वाह!

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  13. yun to har shabd itna sateek hai ki bhaav ke marm tak pahunch raha hai lekin ....

    मालिकों के खौफ
    बिष में बुझे शब्दों
    हर पल होते मान -सम्मान के हनन से
    तिल- तिल जलता हुआ
    पलकों को झुकाए
    याचकों सा हाँथ फैलाये
    डूबता जा रहा है कर्ज में स्वयं

    ye lines aaj ki vyavastha par prahar karti kadvi schhayi ka bayaan bahut hi seedhe seedhe kar rahi hain.

    bahut prabhavi abhivyakti.

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  14. मन में गहरे उतरती पंक्तियाँ ..... बहुत बढ़िया

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  15. मान्यवर, आपने तो शब्द-शब्द में पीड़ा भर दी, कमाल की जादूगरी
    को सलाम।
    प्रथम करें अभिवादन स्वीकृत, बात आपकी सच शत-प्रतिशत।
    कभी आइये ब्लॉग पे मेरे, प्रकट कीजिये अपने अभिमत।
    मेरी रचनायें करती हैं, आप सभी का दिल से स्वागत।
    पक्ष में या प्रतिपक्ष में लिक्खें, सहमत हों या चाह असहमत।
    मेरा लिखना तभी सार्थक, आप सभी की सोच से अवगत।।

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  16. छेदों वाली थाली में
    एक रोटी और
    थोडा सा नमक लेकर
    मलिन बस्त्रों और गमछे में
    अपने घुटनों को पेट से सटाए
    देख रहा है

    bahut sundar mamsaparshi chitran mishr ji .... majdoor diwas 1may ko ise ak bar punh prakashit kijiyega ....badhai tha abhar.

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