Monday, 2 November 2020

AM33 बिटिया का सवाल

 फेस बुक और व्हॉट्स ऐप पर

जैसे ही किसी दोस्त से जुडी
पोस्ट आती 
प्रतिक्रिया में मेरी बधाई जरूर जाती
ऐसे ही किसी दिन मैं भेज रहा था बधाई
तभी मेरे पड़ोस की इक बिटिया आयी
मुस्कुराते हुए बोली
अंकल एक बात  बताएंगे
बुरा तो नहीं मान जाएंगे
मैंने आँख बंद करके जैसे ही मौन स्वीकृति दी
वो भी तपाक से बोली
देखती हूँ आप देते हो नियमित
सैंकड़ों उन लोगों को बधाई
जिन्हें शुक्रिया कहने की तहजीब तक नहीं आयी
क्यों इन्हें आप नहीं भुलाते है
क्यों इस सिलसिले पर विराम नहीं लगाते हैं
वो बिटिया जैसे ही साइलेंट मोड में आयी
किसी न किसी रूप में देते हुए उन सबसे
अपने संबंधों की दुहाई
मैंने बात आगे बढ़ाई
बेटा!वो सब मेरे लिए खास थे
मेरा सहारा थे, मेरा विश्वास थे।
खास थे...सहारा थे...विश्वास  थे
उस बिटिया ने मेरी ही बात दुहरायी
कौतूहल भरी प्रश्नवाचक मुद्रा में आयी
तो मैंने उसकी दुहरायी बात फिर दुहराई
एक गहरी सांस  छोड़ते हुए आगे बढ़ायी
बेटा! 
वक़्त के साथ वो आगे बढ़ गए
उनपे उपाधियों के तमगे जड़ गए
वो चकाचौंध में खो गए
और वक़्त की आंधी में उड़ी धूल में दबकर
रिश्ते दफ़न हो गए
और जब रिश्ते ही नहीं रहे 
तो वर्तमान के संदर्भ 
भूतकालिक हो गए।
मैं जैसे ही खामोश हुआ
बेटी ने फिर पुराने सवाल को छुआ
तो अब तो इन रिश्तों को भुलाईये
बधाई संदेशों पर विराम लगाइये
बिटिया बोले जा रही थी
अपने तर्कों की कसौटी पर मुझे तौले जा रही थी
उससे  नजर मिलाकर
उसे अच्छी तरह सुनने का अहसास दिलाकर
मैं सच में भीतर भीतर उलझ रहा था
और मेरा मौन उस बेटी से कह रहा था
इन्हें कैसे भुला दूँ 
कितना प्रेम है इनसे कैसे बता दूं
प्रेम गली अति साँकरी या में दो न समाही
मेरा मन तो यही दुहरायेगा।
बेशक ये सच है
शास्वत न तो दोस्त है न दोस्ती
क्योंकि जो बदल रहा है 
कैसे हो सकता है शाश्वत
दोस्त तो एक शरीर है
जो बदलता रहता है नित
और दोस्ती....
दोस्ती तो एक भाव है
जिसे बदल देते है शरीर के तत्व खुद
समय पर
शरीर को सिर्फ शरीर चाहिए
साथ बात करने के लिए
खेलने के लिए
सांत्वना पाने के लिए
और भी बहुत कुछ है
जहाँ बदले हुए भाव लिखते हैं
दोस्ती की नयी इबारत
कैसे बताऊँ उसे......
मैं स्वयं बदल गया हूँ
लेकिन छाया चित्र की तरह
अब भी पुराने मंजर 
वो तमाम पुरानी बाते चल रही है 
दिमाग के पटल पर
बिलकुल नहीं बदलता है यह दृश्य
बदलेगा भी कैसे....शास्वत जो है
और जी शास्वत है प्रेम है
तो कैसे भूल जाऊं उस प्रेम को
कैसे कह दूं बिटिया
जब भी कोई नाम या  तस्वीर नजर आती है
वो मुझे उस नाम से जुड़े वर्तमान में नहीं
अतीत में ले जाती है
और मैं तर्पण कर देता हूँ अपनी बधाई 
क्योंकि दोस्ती या भाव ख़त्म होते ही
दोस्त होते ही कहाँ है
और जो होते ही नहीं उनके जवाब 
आते भी कहाँ है
डॉ आशुतोष मिश्र 
आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज ऑफ फार्मेसी, बभनान, गोंडा
उत्तरप्रदेश
9839167801

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