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Sunday, 9 October 2011

(A1/33) पापी को बरगद सा बढ़ाना होता है

चीरकर रहजनो के पाँव
मुस्कुराती थी;
बरगद  की  एक  सूखी ठूंठ
हमेशा ही...
एक  दिन  ऐसे  ही चीरकर भोले शंकर   के पाँव
जब कुटिल मुस्कान  से  मुस्कुराई
तो भोले की अर्धांगिनी पार्वती तिलमिलाईं
जब तक दिल की पीड़ा श्राप बन पाती
भोले बाबा  ने ठूंठ  को महिमामंडित कर डाला
खूब फूलो फलो;
हजारों पक्षियों का बसेरा हो तुम पर
बरदान दे डाला....
पार्वती के होंठों पर खिसियाहट आयी
दुष्ट को वरदान ; बात समझ नहीं आयी
भोले बाबा  ने हंस कर बात घुमाई
तो देवी ने भी हर बात भुलाई
बाबा  का आशीष पाकर
ठूंठ  इतराया
बनकर विशाल बट बृक्ष
झूम झूमकर लहराया
बर्षों  बाद  जब लौटी  पार्वती भोले संग   
तो फिर  चिढ  गयी;
देख  बौराए  बट के मदमाती  उमंग
भोले के तन  से  बहता  लहू  फिर  याद  आया
चेहरा   फिर  तिलमिलाया
लेकिन  जब तक दिल की पीड़ा ने होंठों को हिलाया
एक  जबरदस्त  तूफ़ान  आया
बट ने ठहाका   लगाया
पर दूजे  पल ही
जड़ से  उखड़कर  जमीन  पर आया
बट के इस  हश्र   पर पार्वती ने फिर  सवाल  उठाया  
तो भोले ने प्यार से  समझाया
ठूंठ  सबको   रोज  लहूलुहान  बनाता  
आँधियों  तूफान  को हंसकर   सह  जाता
उसका  अत्याचार   बढ़ता   जाता
पर उसका  बाल  भी बांका  न  हो पाता   
इसलिए   जब भी पापी  को जड़ से  मिटाना  होता है
उसे   बरगद  जैसे  ही बढ़ाना होता है



मेरे  श्रध्येय  गुरु  प्रोफेसर  जे जी अस्थाना  द्वारा    मुझे   सुनाई    गयी  नीति  की  कहानी  का काव्य  रूपांतरण


रचनाकार  
डॉ  आशुतोष  मिश्र   
आचार्य  नरेन्द्र  देव  कॉलेज  ऑफ़  फार्मसी
बभनान , गोंडा , उत्तरप्रदेश
मोबाइल  न०  9839167801

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