Saturday, 28 May 2011

(BP 72) दिल नें माना ही कहाँ था की वो परायी थी


जब वो बिछड़ा था, कसम उसने मेरी खाई   थी
कुछ दिनों    तक   तो उसे याद मेरी आयी   थी

वो    सहारा   थी   मेरी,   मैं   था   सहारा    उसका
वो   ग़ज़ल    मेरी,   नजम   क्षंद  और  रुबाई    थी


मुद्दतों    बाद   ये   ख़त   आया    ढूँढता    मुझको
देखकर   उसको    मेरी   आँखें    क्षलक्षलाई      थी

जिसकी    हर    शै   पे   मेरे होंठ   मुस्कुराते   थे  
उसकी   हर   शै    पे   नदी  आँखों    ने बहाई थी

ए  हवा    कह   दो  उसे मैं खड़ा    हुआ हूँ    वहीँ
आखिरी   बार    जहाँ   पर    वो     मुस्कुराई  थी   

दिल   के   पट   मैंने   कहाँ बंद किये थे अपने
दिल नें माना    ही कहाँ  था की वो  परायी थी


डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान गोंडा उत्तर प्रदेश
मोबाइल ९८३९१६७८०१




2 comments:

  1. ऐ हवा कह दो उसे मैं खड़ा हुआ हूँ वहीं
    आखिरी बार जहाँ पर वो मुस्कुराई थी
    अरे वाह! क्या बात है

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