Showing posts with label ghazal. Show all posts
Showing posts with label ghazal. Show all posts

Friday, 6 July 2012

(BP 45) आपकी आँखों में हम डूबे हुए हैं साहिब


आपकी आँखों में हम डूबे हुए हैं साहिब
कानपुर, लखनऊ क्योंकि सूखे हुए हैं साहिब
जान दे देंगे तेरी आँखों से ना निकलेंगे
मार्च से जून हुआ टूटे हुए हैं  साहिब
तेरी आँखों को कैद-ए-काला पानी जो कहते
मेरी नजरों में वो झूठे  हुए हैं साहिब
हम तेरे मेहमां चंद  रोज  यहाँ
क्यूँ खफा है क्यूँ रूठे हुए हैं साहिब ?
जब हो मंजर हसीन हमको इत्तला करना 
शीशे चश्मे के मेरे फूटे हुए हैं साहिब






डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ.प्र.

Friday, 6 April 2012

(BP 54) चांदनी शब् गुजार दी यूं ही जलकर हमने

हमको दुनिया में ग़मों की ही सौगात मिली
ख्वाइश-ए-गुल थी, खारों की बरसात मिली


चांदनी शब् गुजार दी यूं  ही जलकर हमने
अब्र में चाँद छुपा , तारों की बारात मिली


अपने घर से  मैं बड़ी दूर निकल आया जब
उनके अश्कों से सजी हमको कायनात मिली


एक तमाशा है अभी भी ये सजा-ए- उल्फत
क़त्ल जिसका हुआ उसको ही हवालात मिली


"आशु" दिलदार तेरा यार ,तब यकीन हुआ 
जिक्र आते तेरा जब गुहरों की खैरात मिली  








डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801





Saturday, 31 March 2012

(BP 55) पलकें झुकाना आ गया, पलकें उठाना आ गया

पलकें झुकाना आ गया, पलकें उठाना आ गया
इस तरह अब आपको सबको मिटाना आ गया
दो कदम तनहा सफ़र वो तय नहीं कर पाए हैं
जिंदगी में उनकी जबसे  ये दीवाना आ गया

सोचकर निकले थे घर से आज मस्जिद जायेंगे
करते क्या रह-ए- हरम में मैकदा जब आ गया

खूबसूरत सी लगी है ये  जिंदगी जब- जब हमें
दरम्यां तब- तब कहीं से कोई  फ़साना आ गया

मीना है, मय-मयकदा है, शेख, साकी रिंद है 
ये जमी, जन्नत हुई , मौसम सुहाना आ गया

बज्म में उनकी जबसे जिक्रे-ए-आशु आ गया 
चारसू- चर्चा कहाँ से ये अब बेगाना आ गया 

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मास्य
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801


A2/5

२२१२ २२१२ २२१२ २२१२ MODIFIED

पलकें झुकाना आ गया, पलकें उठाना आ गया
बस इस हुनर से अब उन्हें सबको मिटाना आ गया
 तनहा सफ़र दो भी कदम उनके लिये मुश्किल बड़ा
अब ज़िंदगी में उनकी भी मुझसा दिवाना आ गया
घर से निकलते वक़्त सोचा था कि मस्जिद जायेंगे
करते भी क्या साकी का जब रह में ठिकाना आ गया
जब जब हमें ये जिंदगानी खूबसूरत सी लगी
तब तब कही से जिन्दगी में इक फ़साना आ गया
मीना है मय है मैकदा है शेख साकी रिंद हैं
जन्नत लगे है मैकदा मौसम सुहाना आ गया
महफ़िल में उनकी आज चर्चा हो रहा आशू का है
हर सू में अब कहते बशर आशिक पुराना आ गया

सोचकर निकले थे घर से आज मस्जिद जायेंगे
करते क्या रह-ए- हरम में मैकदा जब आ गया
खूबसूरत सी लगी है ये  जिंदगी जब- जब हमें
दरम्यां तब- तब कहीं से कोई  फ़साना आ गया
मीना है, मय-मयकदा है, शेख, साकी रिंद है 
ये जमी, जन्नत हुई , मौसम सुहाना आ गया
बज्म में उनकी जबसे जिक्रे-ए-आशु आ गया 
चारसू- चर्चा कहाँ से ये अब बेगाना आ गया 




Monday, 26 March 2012

(BP 56) गेसू चेहरे पर बिखर जाते तो अच्छा होता

पल दो पल आप ठहर जाते तो अच्छा होता
मेरे  जज्वात  उभर  जाते तो  अच्छा  होता 


चाँद  सी  आप की सूरत , कसम खुदा की है 
गेसू  चेहरे  पर  बिखर जाते तो अच्छा होता 


तेरे   आँखों  के  समंदर  में  उतरने की जिद 
दो घडी  अश्क  ठहर  जाते  तो अच्छा होता


हुश्न   तेरा  कमाल  का,   क़माल  के जलवे
बस  जरा  और  संवर  जाते तो अच्छा होता


अपनी  पलकें  बिछाये  बैठे  गली  में "आशु"
एक  दफा आप गुजर जाते तो अच्छा होता 




डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश,
मोबाइल नो 9839167801

A2/6
२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ मॉडिफाइड
पल दो पल आप ठहर जाते तो अच्छा होता
आँखों से दिल में उतर जाते तो अच्छा होता 
चाँद सी आपकी सूरत का बढाने जलवा 
गेसू भी रुख पे बिखर जाते तो अच्छा होता 
तेरी आँखों में उतरने की मेरी जिद के लिए
दो घड़ी अश्क़ ठहर जाते तो अच्छा होता
तेरे आँसू जो ठहर जाते तो अच्छा होता 
हुश्न तो आपका माना है क़यामत जैसा
थोडा पर और संवर जाते तो अच्छा होता 
अपनी पलकों को गली में हैं बिछाये आशू
इक दफा आप गुजर जाते तो अच्छा होता  
पल दो पल आप ठहर जाते तो अच्छा होता
मेरी आँखों में उतर जाते तो अच्छा होता
शेर लिखना था मुझे चाँद सी सूरत पे तेरी
रुख पे गर गेसू बिखर जाते तो अच्छा होता
जान लेने के लिए हुश्न हो जिसका काफी
उससे कहते हो संवर जाते तो अच्छा होता
दिल के जो राज झलकते हैं तेरी आखों में
वो लवों पे भी उभर जाते तो अच्छा होता
तेरी आँखों के समंदर से निकल कर आंसू
गर तेरे रुख पे ठहर जाते तो अच्छा होता
राह पे पलकें बिछाई हैं तुम्हारी  मैंने
इक दफा तुम जो गुजर जाते तो अच्छा होता



Thursday, 22 March 2012

(BP 57) तेरी आँखों में ज़माने ने जमाना देखा

तेरी आँखों में ज़माने ने जमाना देखा
रिंद भी देखे,मय देखी, मयखाना देखा 

होश में खुद रही,रिन्दों को बेहोश किया 
ए साकी मैंने तेरे हांथों में पैमाना देखा


तूने रिन्दों के दिलों से हटा दिए हर गम 
पर तेरी आंखों में मैंने इक फ़साना देखा 


आरजू थी की , हाल तेरा  सुनूं मैं तुझसे 
पर आह भरते हुए, नजरों में बहाना देखा 


चेहरा मासूम तेरा आज भी बच्चों  की तरह
दिल में पर कोई जवाँ हमने दीवाना देखा 


"आशु" मालूम नहीं रिन्दों के मंजिल है कहाँ
हमने तो साकी के पहलू में ठिकाना देखा 




डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल, 9839167801


A2/7
2122 21222122 212
तेरी आँखों में ज़माने ने जमाना देखा है
 रिन्द मय मयखाना मंजर इक सुहाना देखा है
रिन्द देखे मय भी देखी और मयखाना  देखा
रिंद भी देखे,मय देखी, मयखाना देखा 
होश में खुद और लूटा होश सारे रिन्दों का 
इस तरह साकी तेरा पीना पिलाना देखा है  
होश में खुद रही,रिन्दों को बेहोश किया
 ए साकी मैंने तेरे हांथों में पैमाना देखा 
तूने रिंदों के दिलों से गम् हटाये सारे पर
 तूने रिन्दों के दिलों से हटा दिए हर गम
 मैंने आँखों मे तेरी कौई फ़साना देखा है
पर तेरी आंखों में मैंने इक फ़साना देखा 
 जुस्तजू दिल की थी मेरी हाल मैं तेरा सुनूँ
जुस्तजू दिल की थी तेरा हाल खुद तुझसे सुनूँ
आरजू थी की , हाल तेरा  सुनूं मैं तुझसे 
पर आह भरते हुए, नजरों में बहाना देखा 
तेरे ओंठों पे मगर मैने  बहाना देखा है पर
तेरे ओंठो पे मैंने बस बहाना देखा है 
तेरा चेहरा आज भी मासूम बच्चों की तरह 
तेरे चेहरे पे है  मासूमी है बच्चे जैसी
 चेहरे पे रहती है मासूमी तेरे बच्चों सी चेहरा है
मासूम तेरा माना बच्चों की तरह दिल में
पर कोई जवाँ हमने दिवाना देखा है  
ये तो रब जाने कि मंजिल है कहाँ
इन रिन्दों की  "आशु" मालूम नहीं रिन्दों के मंजिल है
 कहाँ हमने तो साकी के पहलू में ठिकाना देखा 
आशु ने साकी के पहलू में ठिकाना देखा है 

Sunday, 18 March 2012

(BP 58) दिल धडकता है तेरा ,राज छुपकर रखना

मेरी आँखों में जब ख्वाब  सुनहरा होगा
मुझको मालूम तेरे घर पे भी पहरा होगा 


आप शर्मायेंगे छुपकर के कहीं चिलमन में
जब मेरे यार मेरे सर पर भी सेहरा होगा 


मेरे शेरों का बजन उस घडी बढेगा खुद
जब मेरे सामने गुल सा तेरा चेहरा होगा


इश्क-ओ -हुश्न जब भी अंधे होंगे उल्फत में 
ठीक उस वक़्त जमाना भी ये बहरा होगा 


दिल धडकता है तेरा ,राज छुपाकर रखना
वरना ऐ "आशु" जख्म दिल पे भी गहरा होगा 
A2/9

२१२२ ११२२ ११२२ २२ मॉडिफाइड
जब मेरी आँखों में इक ख्वाब सुनहरा होगा 
तब तेरे घर पे भी मालूम है पहरा होगा 
आप शर्मायेंगे छुपकर के कहीं चिलमन में
जिस घड़ी सर पे बंधा मेरे भी सहरा होगा 
शायरी में भी मेरी जान तभी आयेगी
जब मेरे सामने गुल सा तेरा चेहरा होता

इश्क-ओ -हुश्न जब भी अंधे होंगे उल्फत में
ठीक उस वक़्त जमाना भी ये बहरा होगा

दिल धडकता है तेरा राज न खुल जाये कभी


दिल पे गर जख्म हुआ जख्म ये गहरा होगा 


डॉ आशुतोष मिश्र 
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801 
A2/8
२१२२ ११२२ ११२२ २२ मॉडिफाइड 
जब मेरी आँखों में इक ख्वाब सुनहरा होगा 
तब तेरे घर पे भी मालूम है पहरा होगा  
आप शर्मायेंगे छुपकर के कहीं चिलमन में
जिस घड़ी सर पे बंधा मेरे भी सहरा होगा  
 शायरी में भी मेरी जान तभी आयेगी 
जब मेरे सामने गुल सा तेरा चेहरा होगा
इश्क़ ओ हुश्न जो अंधे हुये हैं उल्फत में 
बेखबर थे की जमाना भी ये बहरा होगा 
ये न सोचा था जमाना भी ये बहरा होगा  
इश्क-ओ -हुश्न जब भी अंधे होंगे उल्फत में
 ठीक उस वक़्त जमाना भी ये बहरा होगा 
दिल धडकता है तेरा राज न खुल जाये कभी 

दिल पे गर जख्म हुआ जख्म ये गहरा होगा

Thursday, 24 November 2011

(A2/31) यूं छलका जाम आँखों से हमें कहते संभल जाओ

जुवां से बात की हमने नजर से खूब समझाया 
वो भोले हैं या हैं शातिर समझ में कुछ नहीं आया 

बड़े दिलकश से लगते हैं ये खंजर दिल में चुभते हैं
बहा न खून जब तक यूं न दिल को भी करार आया

हमारे घर से उनका घर ; कदम भर फासला ही है
बिछा कंटक यूं राहों में हमें हरदम ही तड़पाया 

यूं छलका जाम आँखों से हमें कहते संभल जाओ

भरी मीना दिखा तुमने हमें है रोज बहलाया

गुलाबी सुर्ख लव तेरे लूं अब मैं चूम ख्वाइश है
दबा खुद होंठ होंठों से है तुमने हमको तरसाया

खबर न कौन सी रुत है खबर न कौन सा मौसम
घटा, बारिश, हवा, मंजर सभी ने हमको झुलसाया

A2/31
1222 1222 1222 1222  MODIFIED
जुवां से बात की हमने नजर से खूब समझाया
वो भोले हैं या हैं शातिर समझ में कुछ नहीं आया
बड़े दिलकश से लगते हैं ये खंजर दिल में चुभते हैं
लहू जब दिल से बह निकला तभी दिल को करार आया 
मेरे घर से कदम भर दूर यूं तो उस का घर है पर 
सदा पर कांटे रह पर ही बिछा उसने है तड़पाया 
यूं छलका जाम आँखों से मुझे  कहते संभल जाओ
भरी मीना दिखा उसने मुझे बस रोज बहलाया 
गुलाबी सुर्ख तेरे लव लूं अब मैं चूम ख्वाइश है
दबा खुद होंठ होंठों से है बड़ा तुमने है तरसाया 
न तन की सुधि रही मुझको न मन को चैन मिल पाया


घटा वारिश हवा मौसम सभी ने हमको झुलसाया  

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र दो कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल नो ९८३९१६७८०१

लिखिए अपनी भाषा में