Saturday, 31 March 2012

(BP 55) पलकें झुकाना आ गया, पलकें उठाना आ गया

पलकें झुकाना आ गया, पलकें उठाना आ गया
इस तरह अब आपको सबको मिटाना आ गया
दो कदम तनहा सफ़र वो तय नहीं कर पाए हैं
जिंदगी में उनकी जबसे  ये दीवाना आ गया

सोचकर निकले थे घर से आज मस्जिद जायेंगे
करते क्या रह-ए- हरम में मैकदा जब आ गया

खूबसूरत सी लगी है ये  जिंदगी जब- जब हमें
दरम्यां तब- तब कहीं से कोई  फ़साना आ गया

मीना है, मय-मयकदा है, शेख, साकी रिंद है 
ये जमी, जन्नत हुई , मौसम सुहाना आ गया

बज्म में उनकी जबसे जिक्रे-ए-आशु आ गया 
चारसू- चर्चा कहाँ से ये अब बेगाना आ गया 

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मास्य
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801


A2/5

२२१२ २२१२ २२१२ २२१२ MODIFIED

पलकें झुकाना आ गया, पलकें उठाना आ गया
बस इस हुनर से अब उन्हें सबको मिटाना आ गया
 तनहा सफ़र दो भी कदम उनके लिये मुश्किल बड़ा
अब ज़िंदगी में उनकी भी मुझसा दिवाना आ गया
घर से निकलते वक़्त सोचा था कि मस्जिद जायेंगे
करते भी क्या साकी का जब रह में ठिकाना आ गया
जब जब हमें ये जिंदगानी खूबसूरत सी लगी
तब तब कही से जिन्दगी में इक फ़साना आ गया
मीना है मय है मैकदा है शेख साकी रिंद हैं
जन्नत लगे है मैकदा मौसम सुहाना आ गया
महफ़िल में उनकी आज चर्चा हो रहा आशू का है
हर सू में अब कहते बशर आशिक पुराना आ गया

सोचकर निकले थे घर से आज मस्जिद जायेंगे
करते क्या रह-ए- हरम में मैकदा जब आ गया
खूबसूरत सी लगी है ये  जिंदगी जब- जब हमें
दरम्यां तब- तब कहीं से कोई  फ़साना आ गया
मीना है, मय-मयकदा है, शेख, साकी रिंद है 
ये जमी, जन्नत हुई , मौसम सुहाना आ गया
बज्म में उनकी जबसे जिक्रे-ए-आशु आ गया 
चारसू- चर्चा कहाँ से ये अब बेगाना आ गया 




Monday, 26 March 2012

(BP 56) गेसू चेहरे पर बिखर जाते तो अच्छा होता

पल दो पल आप ठहर जाते तो अच्छा होता
मेरे  जज्वात  उभर  जाते तो  अच्छा  होता 


चाँद  सी  आप की सूरत , कसम खुदा की है 
गेसू  चेहरे  पर  बिखर जाते तो अच्छा होता 


तेरे   आँखों  के  समंदर  में  उतरने की जिद 
दो घडी  अश्क  ठहर  जाते  तो अच्छा होता


हुश्न   तेरा  कमाल  का,   क़माल  के जलवे
बस  जरा  और  संवर  जाते तो अच्छा होता


अपनी  पलकें  बिछाये  बैठे  गली  में "आशु"
एक  दफा आप गुजर जाते तो अच्छा होता 




डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश,
मोबाइल नो 9839167801

A2/6
२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ मॉडिफाइड
पल दो पल आप ठहर जाते तो अच्छा होता
आँखों से दिल में उतर जाते तो अच्छा होता 
चाँद सी आपकी सूरत का बढाने जलवा 
गेसू भी रुख पे बिखर जाते तो अच्छा होता 
तेरी आँखों में उतरने की मेरी जिद के लिए
दो घड़ी अश्क़ ठहर जाते तो अच्छा होता
तेरे आँसू जो ठहर जाते तो अच्छा होता 
हुश्न तो आपका माना है क़यामत जैसा
थोडा पर और संवर जाते तो अच्छा होता 
अपनी पलकों को गली में हैं बिछाये आशू
इक दफा आप गुजर जाते तो अच्छा होता  
पल दो पल आप ठहर जाते तो अच्छा होता
मेरी आँखों में उतर जाते तो अच्छा होता
शेर लिखना था मुझे चाँद सी सूरत पे तेरी
रुख पे गर गेसू बिखर जाते तो अच्छा होता
जान लेने के लिए हुश्न हो जिसका काफी
उससे कहते हो संवर जाते तो अच्छा होता
दिल के जो राज झलकते हैं तेरी आखों में
वो लवों पे भी उभर जाते तो अच्छा होता
तेरी आँखों के समंदर से निकल कर आंसू
गर तेरे रुख पे ठहर जाते तो अच्छा होता
राह पे पलकें बिछाई हैं तुम्हारी  मैंने
इक दफा तुम जो गुजर जाते तो अच्छा होता



Thursday, 22 March 2012

(BP 57) तेरी आँखों में ज़माने ने जमाना देखा

तेरी आँखों में ज़माने ने जमाना देखा
रिंद भी देखे,मय देखी, मयखाना देखा 

होश में खुद रही,रिन्दों को बेहोश किया 
ए साकी मैंने तेरे हांथों में पैमाना देखा


तूने रिन्दों के दिलों से हटा दिए हर गम 
पर तेरी आंखों में मैंने इक फ़साना देखा 


आरजू थी की , हाल तेरा  सुनूं मैं तुझसे 
पर आह भरते हुए, नजरों में बहाना देखा 


चेहरा मासूम तेरा आज भी बच्चों  की तरह
दिल में पर कोई जवाँ हमने दीवाना देखा 


"आशु" मालूम नहीं रिन्दों के मंजिल है कहाँ
हमने तो साकी के पहलू में ठिकाना देखा 




डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल, 9839167801


A2/7
2122 21222122 212
तेरी आँखों में ज़माने ने जमाना देखा है
 रिन्द मय मयखाना मंजर इक सुहाना देखा है
रिन्द देखे मय भी देखी और मयखाना  देखा
रिंद भी देखे,मय देखी, मयखाना देखा 
होश में खुद और लूटा होश सारे रिन्दों का 
इस तरह साकी तेरा पीना पिलाना देखा है  
होश में खुद रही,रिन्दों को बेहोश किया
 ए साकी मैंने तेरे हांथों में पैमाना देखा 
तूने रिंदों के दिलों से गम् हटाये सारे पर
 तूने रिन्दों के दिलों से हटा दिए हर गम
 मैंने आँखों मे तेरी कौई फ़साना देखा है
पर तेरी आंखों में मैंने इक फ़साना देखा 
 जुस्तजू दिल की थी मेरी हाल मैं तेरा सुनूँ
जुस्तजू दिल की थी तेरा हाल खुद तुझसे सुनूँ
आरजू थी की , हाल तेरा  सुनूं मैं तुझसे 
पर आह भरते हुए, नजरों में बहाना देखा 
तेरे ओंठों पे मगर मैने  बहाना देखा है पर
तेरे ओंठो पे मैंने बस बहाना देखा है 
तेरा चेहरा आज भी मासूम बच्चों की तरह 
तेरे चेहरे पे है  मासूमी है बच्चे जैसी
 चेहरे पे रहती है मासूमी तेरे बच्चों सी चेहरा है
मासूम तेरा माना बच्चों की तरह दिल में
पर कोई जवाँ हमने दिवाना देखा है  
ये तो रब जाने कि मंजिल है कहाँ
इन रिन्दों की  "आशु" मालूम नहीं रिन्दों के मंजिल है
 कहाँ हमने तो साकी के पहलू में ठिकाना देखा 
आशु ने साकी के पहलू में ठिकाना देखा है 

Sunday, 18 March 2012

(BP 58) दिल धडकता है तेरा ,राज छुपकर रखना

मेरी आँखों में जब ख्वाब  सुनहरा होगा
मुझको मालूम तेरे घर पे भी पहरा होगा 


आप शर्मायेंगे छुपकर के कहीं चिलमन में
जब मेरे यार मेरे सर पर भी सेहरा होगा 


मेरे शेरों का बजन उस घडी बढेगा खुद
जब मेरे सामने गुल सा तेरा चेहरा होगा


इश्क-ओ -हुश्न जब भी अंधे होंगे उल्फत में 
ठीक उस वक़्त जमाना भी ये बहरा होगा 


दिल धडकता है तेरा ,राज छुपाकर रखना
वरना ऐ "आशु" जख्म दिल पे भी गहरा होगा 
A2/9

२१२२ ११२२ ११२२ २२ मॉडिफाइड
जब मेरी आँखों में इक ख्वाब सुनहरा होगा 
तब तेरे घर पे भी मालूम है पहरा होगा 
आप शर्मायेंगे छुपकर के कहीं चिलमन में
जिस घड़ी सर पे बंधा मेरे भी सहरा होगा 
शायरी में भी मेरी जान तभी आयेगी
जब मेरे सामने गुल सा तेरा चेहरा होता

इश्क-ओ -हुश्न जब भी अंधे होंगे उल्फत में
ठीक उस वक़्त जमाना भी ये बहरा होगा

दिल धडकता है तेरा राज न खुल जाये कभी


दिल पे गर जख्म हुआ जख्म ये गहरा होगा 


डॉ आशुतोष मिश्र 
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801 
A2/8
२१२२ ११२२ ११२२ २२ मॉडिफाइड 
जब मेरी आँखों में इक ख्वाब सुनहरा होगा 
तब तेरे घर पे भी मालूम है पहरा होगा  
आप शर्मायेंगे छुपकर के कहीं चिलमन में
जिस घड़ी सर पे बंधा मेरे भी सहरा होगा  
 शायरी में भी मेरी जान तभी आयेगी 
जब मेरे सामने गुल सा तेरा चेहरा होगा
इश्क़ ओ हुश्न जो अंधे हुये हैं उल्फत में 
बेखबर थे की जमाना भी ये बहरा होगा 
ये न सोचा था जमाना भी ये बहरा होगा  
इश्क-ओ -हुश्न जब भी अंधे होंगे उल्फत में
 ठीक उस वक़्त जमाना भी ये बहरा होगा 
दिल धडकता है तेरा राज न खुल जाये कभी 

दिल पे गर जख्म हुआ जख्म ये गहरा होगा

Tuesday, 13 March 2012

(BP 59) आजादी के गीत हम तो गाने लगे हैं

आजादी के गीत हम तो गाने लगे हैं
लाल किले पे झंडा भी फहराने लगे हैं
बुलबुलों को  पिंजरों से उड़ने लगे हैं
भूखे बच्चे पेटों को सहलाने लगे हैं
रोते हुए झुनझुने बजाने लगे हैं
आजादी के गीत .....................
नानी कहती थी यहाँ मणिधारी नाग हैं
हमने तो देखा है सत्ताधारी नाग हैं
कुर्सियों पर बैठे फन लहराने लगे हैं
जात पात का जहर अब फ़ैलाने लगे हैं
अब ये डामर यूरिया चबाने लगे हैं
दूध की जगह चारा पचाने लगे हैं
भूखे बच्चों को गिनती सिखाने लगे हैं
आजादी के गीत.........................
खूनी और दरिन्दे तो सरताज हो गए
भोली जनता चिडी, नेता बाज हो गए
घोटालों की लगी देश को यारों कैसी खाज
शांत सरीफों की बस्ती में अब गुंडों का राज
मानवता की होलियाँ जलाने लगे हैं
आदमी ही आदमी को खाने लगे हैं
लम्बे चौड़े बादों से लुभाने लगे हैं
आजादी के गीत ...........................
अब पतंग भी अपनी है अपनी ही डोरी यारों
अब कहार भी अपने हैं अपनी ही डोली यारों
सुरभि,कुसुम चमन, माली हैं बीज हमारे यारों
पर जयचंद हजारों रंग दिखने लगे हैं
शकुनी  फिर से चौपडें बिछाने लगे हैं
दुर्योधन को भीम से लड़ने लगे हैं
आजादी के गीत हम तो गाने लगे हैं



कॉलेज जीवन की रचना
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल नो 9839167801





Tuesday, 6 March 2012

(BP60) होली है भाई होली है



रंग बिरंगी है रंगोली
मस्तानो की निकली टोली
कहीं अबीर गुलाल कहीं पर
चली धडल्ले भंग की गोली
 पिचकारी से  छूटे गोली 
रहे सलामत कैसे  चोली 
ईना, मीना, डीका, रीना 
नहीं  बचेगी कोई भोली 
आज अधर खामोश रहेंगे 
आज रंग हैं सबकी बोली 
आज  नहीं छोड़ेंगे भौजी 
बुरा न मानो है ये होली



 होली पर आप सभी को मेरे और मेरे परिवार की और से हार्दिक शुभकानाएं ...होली के बिबिध रंगों  की तरह आपका जीवन   रंगबिरंगा बना रहे ....खुशियाँ आपके कदम चूमे ..आपके अंतर का कलुष हटे.......प्रेम का साम्राज्य चहु ओर स्थापित हो ..पुनः इन्ही शुभकामनाओं के साथ 


डॉ आशुतोष मिश्र 
निदेशक 
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी 
बभनान , गोंडा . उत्तरप्रदेश 
मोबाइल न०  9839167801

Sunday, 8 January 2012

(A1/29) सबसे भ्रष्ट ही, हो गया है हमारा सरदार

चोरों के एक गाँव में
चोरों ने पंचायत बिठाई
एक नेता चुनने की बात उठाई
किसी ने दी सर्बाधिक चोरियों   की दुहाई  
किसी ने बड़ी चोरियां गिन्वायीं
हर  करतूत  के अंक  निर्धारित हुए
ही अव्वल थे वो नेता साबित हुए
बात जब ये चर्चा में आई
बेईमानो, डकैतों ,लुटेरों
बलात्कारियों  ,भ्रस्तों, घूसखोरों
अत्याचारियों और देशद्रोहियों ने
अपने-अपने ग्रामों में अलख जगाई
नेता बनाने की कवायद्  चलाई
चोरों की तरह
सबसे बड़ा अत्याचारी, भ्रस्ताचारी
बलात्कारी  और व्यभिचारी  
सिरमौर बनाये गए
बक्त के साथ हर  ग्राम  ने अपना  कारोबार  बढाया
परिणाम  स्वरुप
लुटेरा चोर के
और बलात्कारी  ब्याभिचारी के करीब आया
धीरे धीरे ये मसला गरमाया
हर आदमी ने सारे गुणों  को  अपनाया  
चोर   लुटेरे बलात्कारी व्याभिचारी
एक रंग में ढल गए
दिल से दिल, ग्राम से ग्राम मिल गए
बड़े बड़े शहर  और देश बन गए
फिर सबने मिलकर नेत्रित्व का मसला उठाया
न चोरी की चर्चा हुई
न भ्रस्टाचार का मसला चाय
जो सर्वश्रेष्ठ  आलराउंडर  था
उसने अपना दावा मजबूत बनाया
तबसे ये सिलसिला चला आ रहा है
हर चुनाव इसका परिणाम बता रहा है
फिर किसी रोज भीड़ में कोई फुसफुसाया
इस व्यवस्था को  गलत बताया
मैंने उसे समझाया
व्यवस्था को  गलत बता रहे हो 
बबूल पे आम का ख्वाब सजा रहे हो
हम ईमानदार   होते तो ईमानदार चुनते
देशभक्त होते तो देशभक्ति  पे मरते
नेत्रित्व के लिए तो सर्वश्रेष्ठ  के पास जायेंगे
चोरों का नेता चोरों को  ही बनायेंगे
क्या शिक्षक पढ़ा रहा है ?
क्या दुधिया दूध में जहर नहीं मिला रहा है ?
क्या हर शख्श  उपरी कमाई  का स्वप्न नहीं सजा रहा है?
क्या शोधकर्ता शोध के सही परिणाम ला रहा है?
क्या संगीतकार   धुन  नहीं चुरा  रहा है ?
क्या लेखक दूसरों की लेखनी के शब्द नहीं घुमा रहा है?
नकली दबाएँ कौन बना रहा है?
सड़कों का डामर कौन पचा रहा है?
पेड़ किसने काटे, कौन लगा रहा है ?
ऐसे अनगिनत प्रश्नों के जबाब में
हर आदमी उलझ जायेगा
दिल आंसुओ से भर जायेगा
पहले खुद बुरे संस्कार दिल से दिमाग से हटाओ
फिर परिवार को  समझाओ
क्रांति की अलख देश में जगाओ
सदियों का मैला तब तक नहीं हटेगा
जब तक हर इंसान नहीं जागेगा
पुलिश  और नेता पे तोहमत लगाने से
देश नहीं सुधर जायेगा
ये आसमान से नहीं टपके हैं
ये हमारे तुम्हारे घरो के बच्चे हैं
जब सबने मिलकर भ्रष्टता की कर दी है हद पार
तो सबसे भ्रष्ट ही हो गया है हमारा सरदार

वंशधर परंपरा के चहेतों
अपने दिल दिमाग से विकृतियों   को हटाओ
वर्ना पछताओगे
तुम्हारी  जिंदगी के  दिन तो जैसे तैसे कट  जायेंगे
पर तुम्हारे नौनिहाल पैदा   होते ही मर जायेंगे !!





डॉ आशुतोष मिश्र
निदेशक
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801

Tuesday, 27 December 2011

(A/1/42) नए वर्ष में नए गीत हों

           नए वर्ष में नए गीत हों

           नए राग हों,नए क्षंद हों

           भाषाओँ, मजहब के नामों

          कभी वतन में जंग ना हों


                जलकर खुद यूं रोज दिवाकर 

                जग को रोशन करता है 

                हम जुगनू ही सही

                हौसले कभी हमारे मंद न हों 


         उत्तर-दक्षिण पूरब-पश्चिम

         जहाँ कहीं हो मन घूमें

         देशों की सीमाएं झूठी

         उन्मुक्त उड़ाने बंद ना हों


                  मसला जब तय होना हो

                  दुनिया की भूखी जनता का

                  नेताओं के बीच कभी भी

                  होली सा हुरदंग न हो

 

         प्रलय रोकना है तो हमको

         मिलकर बृक्ष लगाने होंगे

         ओजोन कवच के छेद कभी

         भाषण  बाज़ी से बंद न हों

 

 

एक बार पुनः ह्रदय की अनंत गहरायिओं में श्रजित शुभकामनाओं के साथ कामना करता हूँ की नव वर्ष २०१२ आपके जीवन में खुशियों का पर्याय बनकर आये ..सौभाग्य और सफलता आपके कदम चूमे...आप और आपका परिवार स्वस्थ और प्रसन्न रहते हुए प्रगति के नए सोपान तय करे ..इन्ही शब्दों के साथ ..............हमेशा ही आपका 


डॉ आशुतोष मिश्र

निदेशक

आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न० 9839167801

Sunday, 25 December 2011

(A/36) जंगल बेदना

जंगल बेदना 


सदय होने का मिला परिणाम क्या
मनु को बचाने का मिला प्रतिदान क्या
आध्यात्म फूला-फला  जिसकी गोद में
वो जल रहा है क्यों स्वयं अब क्रोध में
क्यूँ कुपित न हो उजाड़ा जब उसे
दोष मनु पुत्रों का देगा फिर किसे
गैर न मानी मनु संतति कभी
सैंकड़ों पर पुत्र उसके और भी
मौन तरु जो झूमते मस्ती में अपने
चट्टाने पाहन चूमती , लहराती तटिनी
गर्जना, चिंघाड़ उसके लाडलों की
चौकड़ी मासूम से मृग दलों की
झर-झराते सैंकड़ों झरने भी अल्हड 
बन झाड़ियाँ झर्बेरियां कैसे सुघड़
ढलती निशा में उंघते जंगल
रात सारी गूंजते जंगल
अपनी धुन हैं गीत भी संगीत  भी
दुर्गम किला, राजा, प्रजा, मंत्री सभी 
मनुज को दी प्राण बायु, फल- फूल भी
बृष्टि की बूंदे भी, कंद मूल भी
सोचते मनु पुत्र पर क्या? राम जाने!
जंगलों ने तो दिए अनुपम खजाने
किन्तु  क्यों बिष घोलते मनु पुत्र अब
मारते निज स्वार्थ बश वन पुत्र अब
साम्राज्य जंगल का सिमटता जा रहा है
सीने में पर्वत के अब बम फट रहे हैं
चट्टानों  पर भी बरसते सतत घन
बेदना करते बयां अब मूक पाहन
मनु पुत्र अपनी श्रेष्ठता दिखला  रहा है
सच! मौत का ही जाल बुनता जा रहा है
नित्य आयेंगे भूकंप होंगे भूस्खलन
ललकारेंगी   तटिनी, चट्टानें रौद्र पाहन
उम्मीद न कर ए मनु अब शान्ति की
आग तूने ही लगाई क्रान्ति की
मायने ना जीत के न हार के
इतराने का परिणाम खुद ही देख लो
भूकंप, गर्मी, बाढ़ कुछ तो सोच लो
अब भी समय है -हे मनु कुछ जान लो
प्रकृति की शक्ति जरा पहचान लो
क्योंकि सबने भूल की ऐसा नहीं है
बोये सबने शूल भी ऐसा नहीं है
मनु के सदय जो पुत्र हैं; वो मान लें
पागलों को मारना हैं ठान लें
संधि का सन्देश लेके स्वयं जाएँ
नंगे गिरि को बस्त्र पहनाएं
अतिक्रमित साम्राज्य जब हम बापस करेंगे
हम भी  हँसेंगे   और जंगल भी हँसेंगे  हसेंगे





कॉलेज जीवन के कृति




डॉ आशुतोष मिश्र
निदेशक
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, 9839167801



















Tuesday, 20 December 2011

(A1/37) मौत की झोली

मौत की झोली 
आलू, भिन्डी, गोभी के साथ
मौत की झोली घर आयी 
हमने चटखारे लेकर खाई
बचे रोटी, चावल, सब्जी  के छिलके
कर दिए फिर झोली के हवाले
छत  से मुस्कुराते हुए नीचे गिराई
पर गिरते ही मौत की झोली मुस्कुराई
सड़क पर गिरते ही अपना जाल बिछाया
भोजन की खुश्बू  को हवा में फैलाया
पास बैठी गाय  को खुश्बू भा गयी
भूखी गाय पास आ गयी
झोली समेत सब चबा गयी
लेकिन बैठते ही घबरा गयी
मौत की झोली आंत में जम गयी
रोटी गाय को महँगी  पड़ गयी
गाय कुछ देर खूब तडपी
फिर बेदम होकर सड़क पर लुढकी
फिर कीटाणुओं ने मृत शारीर पर छावनी बनायी
बीमारी की मिसाइलें चलाईं
बीमारी महामारी बनकर छा गयी
बस्ती के कई लोगों को खा गयी
झोली मौत की मुस्कुराती रही
आंत में बैठकर जश्न मनाती रही
आंत भी धीरे- धीरे गल गयी
जिंदगी की सौत बाहर निकल गयी
बरसात उसे खेत तक ले आयी
परत -दर- परत मिटटी चढ़ाई
जब पौधों की जडें इससे टकराईं
इसका कुछ नहीं बिगाड़ पायीं 
पौधे खड़े- खड़े मुरझा गए
अकाल के दानव गाँव  में आ गए
मानवता दम तोड़ने लगी
दानवता सर चढ़कर बोलने लगी
सुकून फिर भी न मिला
तो जहरीली गैसों को रिसाया
सैंकड़ों जीवों का कर गयी सफाया
अपनी विजयश्री का गीत गया
लेकिन तभी एक बिद्वान से टकरा गयी
तांडव की कथा उसे समझ में आ गयी
उसने एक अभियान छेड़ दिया
पूरे  देश से इन झोलियों को इकठ्ठा किया
किन्तु  ज्ञान अनुभव  से फिर मात खा गया 
इनके ढेर में आग लगा गया
झोली मरते- मरते कहर ढा गयी
ओजोने  की परत में छेद बना  गयी
तबसे; रोज अल्ट्रावायलेट किरनें 
धरती पर आती हैं 
धरती का तापमान बढ़ाती हैं
जिन्दगी की हर सांस 
संकट में घिरती जा रही है
पर धन्य है मनु संतति
मौत की झोली में सामान ला रही है
मौत का तांडव बार-बार दोहरा रही है




कॉलेज जीवन की एक कृति
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उत्तरप्रदेश
मोबाइल न०  9839167801



































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